दिल्ली में अमित शाह से मुलाकात के बाद MP में बड़ा सियासी फेरबदल? कैबिनेट बैठक से दिग्गज गायब
Wednesday, Mar 04, 2026-12:45 PM (IST)
भोपाल। मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों हलचल तेज है। अमित शाह से दिल्ली में अलग-अलग मुलाकातों के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में बड़वानी में हुई कृषि कैबिनेट बैठक से दो दिग्गज मंत्री—कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद सिंह पटेल—का नदारद रहना सियासी चर्चाओं को नई दिशा दे गया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह महज संयोग है या फिर राज्य मंत्रिमंडल में बड़े फेरबदल की आहट?
दिल्ली की मुलाकातों ने बढ़ाई हलचल
सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय नेतृत्व ने तीनों नेताओं को अलग-अलग वन-टू-वन चर्चा के लिए बुलाया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठकें सामान्य औपचारिकता नहीं थीं, बल्कि संगठन और सरकार के समीकरणों पर गंभीर मंथन का हिस्सा थीं। इन मुलाकातों के ठीक दो दिन बाद जब बड़वानी में अहम कैबिनेट बैठक हुई, तो विजयवर्गीय और पटेल की गैरमौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए।
बैठक से दूरी, मैदान में सक्रियता
कैबिनेट बैठक के दिन विजयवर्गीय इंदौर में भगोरिया उत्सव में शामिल हुए और बाद में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा से मुलाकात की। वहीं प्रह्लाद पटेल भोपाल और विदिशा में कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय रहे। दोनों नेताओं की समानांतर सक्रियता यह संकेत देती है कि वे राजनीतिक रूप से हाशिए पर नहीं हैं, बल्कि नई भूमिका की तैयारी में भी हो सकते हैं।
सीनियर बनाम जूनियर की अंदरूनी चर्चा
2023 विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद की दौड़ में इन दोनों नेताओं का नाम प्रमुखता से लिया गया था। ऐसे में मोहन यादव की कैबिनेट में उनकी भूमिका को लेकर शुरू से ही ‘सीनियर बनाम जूनियर’ की चर्चाएं चलती रही हैं। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि इन दिग्गजों को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी जिम्मेदारी मिलती है, तो इससे राज्य में नेतृत्व संतुलन का नया समीकरण बनेगा।
क्या संकेत दे रहा है सियासी गणित?
दिल्ली में शाह की सक्रियता को आलाकमान की रणनीतिक पहल के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी राज्य में संगठन और सरकार के बीच तालमेल मजबूत करना चाहती है। यदि मंत्रिमंडल में फेरबदल होता है या विजयवर्गीय–पटेल को नई भूमिका मिलती है, तो यह मोहन यादव के लिए सरकार पर पकड़ और मजबूत करने का अवसर साबित हो सकता है। फिलहाल, मध्य प्रदेश की राजनीति में उठते इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में साफ होंगे, लेकिन इतना तय है कि दिल्ली की बैठकों ने भोपाल की सियासत में हलचल जरूर बढ़ा दी है।

