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BJP में अंदरूनी संग्राम! “कृष्ण” नाम के दो नेताओं को पार्टी ने थमाया नोटिस, सिंधिया vs KP यादव समर्थकों की लड़ाई तेज

Thursday, May 14, 2026-06:53 PM (IST)

गुना (मिसबाह नूर): गुना भाजपा में इन दिनों “कृष्ण” नाम को लेकर सियासी घमासान तेज होता जा रहा है। पार्टी के भीतर चल रही खींचतान अब खुलकर सिंधिया समर्थक और केपी यादव समर्थक खेमों की टकराहट के रूप में दिखाई देने लगी है। हालात ऐसे हैं कि कभी किसी कृष्ण की टिप्पणी पर नोटिस जारी हो रहा है, तो कभी किसी दूसरे कृष्ण को सोशल मीडिया पोस्ट के कारण अनुशासनहीनता का आरोपी बना दिया जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में अब लोग चुटकी लेते हुए पूछ रहे हैं— भाजपा को आखिर “कृष्ण” परेशान कर रहे हैं या “कृष्ण” नाम वालों को भाजपा परेशान कर रही है?

पूरा घटनाक्रम भोपाल से शुरू हुआ, जब सिंधिया समर्थक माने जाने वाले कृष्ण घाडगे ने खाद्य नागरिक आपूर्ति निगम अध्यक्ष और पूर्व सांसद डॉ. कृष्णपाल सिंह यादव को लेकर कथित टिप्पणी कर दी। मामला सीधे संगठन तक पहुंचा और जिला अध्यक्ष रविंद्र यती ने तत्काल नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांग लिया। हालांकि राजनीति में सफाई भी एक कला मानी जाती है, इसलिए घाडगे ने जल्द ही स्पष्ट कर दिया कि उनकी “बालक बुद्धि” वाली टिप्पणी राहुल गांधी के लिए थी, डॉ. कृष्णपाल सिंह यादव के लिए नहीं। इसके बाद मामला कुछ शांत जरूर हुआ, लेकिन “कृष्ण प्रकरण” यहीं खत्म नहीं हुआ।

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अब इसका दूसरा अध्याय गुना में खुल गया। भाजपा कैंट मंडल उपाध्यक्ष कृष्णपाल यादव, जिन्हें पूर्व सांसद और वर्तमान निगम अध्यक्ष डॉ. कृष्णपाल सिंह यादव का करीबी समर्थक माना जाता है, उन्हें जिला भाजपा महामंत्री संतोष धाकड़ ने कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। आरोप है कि वे लगातार सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट कर रहे थे, जिनसे पार्टी और वरिष्ठ नेताओं की छवि धूमिल हो रही थी। जिलाध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह सिकरवार के निर्देश पर जारी नोटिस में तीन दिन के भीतर जवाब मांगा गया है और संतोषजनक उत्तर नहीं मिलने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

अब राजनीतिक जानकार इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ अनुशासनहीनता का मामला नहीं मान रहे, बल्कि इसे भाजपा के भीतर सिंधिया समर्थक और केपी यादव समर्थक खेमों के बीच बढ़ती खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है। गुना की राजनीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव लगातार मजबूत हुआ है और संगठन में उनके समर्थकों की पकड़ पहले से ज्यादा दिखाई दे रही है। ऐसे में पार्टी लाइन से हटकर कोई भी बयान या सोशल मीडिया पोस्ट सीधे शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला माना जा रहा है।

सिंधिया समर्थकों का कहना है कि संगठन सर्वोपरि है और अनुशासन बनाए रखना जरूरी है। उनका मानना है कि जब पार्टी में ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा बड़ा राष्ट्रीय चेहरा मौजूद हो, तब स्थानीय स्तर की बयानबाज़ी संगठन की साख को नुकसान पहुंचा सकती है। वहीं, केपी यादव समर्थकों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि उनके समर्थकों को निशाने पर लिया जा रहा है और संगठनात्मक कार्रवाई के जरिए संदेश देने की कोशिश हो रही है।

PunjabKesariदिलचस्प बात यह है कि हर विवाद के केंद्र में “कृष्ण” नाम ही रहा। पहले कृष्ण घाडगे चर्चा में आए और अब कृष्णपाल यादव। दोनों ही अलग-अलग खेमों से जुड़े माने जाते हैं और दोनों मामलों ने भाजपा की अंदरूनी राजनीति को खुलकर सामने ला दिया है। एक “कृष्ण” दूसरे “कृष्ण” के पक्ष में दिखाई दिया, तो दूसरा विरोध में।

सोशल मीडिया पर लोग अब यह कहकर मजाक कर रहे हैं कि भाजपा कार्यालय में इन दिनों सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द शायद “कारण बताओ नोटिस” ही है। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि पार्टी में बयान देने से पहले नेताओं को यह भी देख लेना चाहिए कि कहीं उनका नाम “कृष्ण” तो नहीं।

हालांकि भाजपा संगठन इसे सामान्य अनुशासनात्मक प्रक्रिया बता रहा है, लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा यही है कि गुना भाजपा में इन दिनों दो चीजें सबसे ज्यादा सक्रिय हैं - एक ज्योतिरादित्य सिंधिया का बढ़ता राजनीतिक प्रभाव और दूसरा “कृष्ण” विवाद। कुल मिलाकर, गुना की राजनीति में फिलहाल “कृष्ण लीला” पूरे रंग में दिखाई दे रही है और जनता भी दिलचस्पी के साथ यह देख रही है कि अगला नोटिस आखिर किस “कृष्ण” के नाम जारी होता है।


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Content Editor

Himansh sharma

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