कांग्रेस के इन दिग्गज नेताओं पर वजूद बचाने का संकट, आलाकमान की दो टूक, जनता के बीच खुद को साबित करना होगा
Thursday, Mar 26, 2026-04:38 PM (IST)
(भोपाल): मध्य प्रदेश में कांग्रेस खुद को मजबूत करने में लगातार लगी हुई है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी भी संगठन और पार्टी की मजबूती के लिए लगे हुए हैं। वहीं इसी बीच कांग्रेस के कई पुराने नेता भी खुद को स्थापित और फिर से अपना प्रभाव जमाने के लिए मैदान में उतर चुके हैं। दरअसल इन नेताओं को अपना वजूद बचाने और फिर से खुद को जमाने के लिए जनता के बीच जाना मजबूरी बन गया है।
सत्ता के लिए तरस रही कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं पर अपनी पहचान बनाए रखने का संकट मंडरा रहा है। जमीनी आधार को फिर से मजबूत करने के लिए कई नेता प्रदेश के कई हिस्सों में जनता के बीच पहुंच रहे हैं।
वैसे को नेता इसे पार्टी मजबूती और कार्यकर्ताओं में फिर से जोश भरने का अभियान बता रहे हैं लेकिन इन नेताओं को अहसास हो गया है कि अपना अस्तित्व बचाने के लिए अब जनता के द्धार जाकर खड़ा होना ही पड़ेगा। मनमानी करने वाले नेताओं को अपना वजूद बचाने लिए जनता के बीच जाने को मजबूर होना पड़ रहा है।
गौरतलब है प्रदेश कांग्रेस के कई ऐसे नेता हैं जो संगठन और जनता के बीच से गायब हैं। इनमें कुछ नेता तो ऐसे हैं, जिनकी कभी अच्छा खासा नाम होता था लेकिन उनके सामने अब जनता के बीच अपना वजूद बचाने का संकट है। इसलिए कुछ नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं की नब्ज टटोलने के लिए भ्रमण शुरू कर दिया है।
गौर करने वाली बात है कि कई नेता ऐसे भी हैं जिनके पास संगठन की कोई ऐसी बड़ी जिम्मेदारी नहीं है कि वे कार्यकर्ताओं और जनता के साथ संवाद कर सकें। ऐसे में इन नेताओं ने खुद ही मैदान में उतरना शुरु कर दिया है और जनता से संवाद प्रारंभ कर दिया है।
फिर से खुद को स्थापित करने की चुनौती
अब इस सिलसिले में बात करें तो पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल इन दिनों बुंदेलखंड के दौरे पर हैं। इससे पहले वे चंबल का प्रवास भी कर चुके है। खुद को सक्रिय रखने के लिए उन्होंने अकेले ही मोर्चा संभाल लिया है। वो पुराने कार्यकर्ताओं फिर से सक्रिय करने की बात कहकर मैदान में डटे हैं।
वहीं दूसरी ओर पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण यादव भी आजकल गायब हैं, उनके पास ऐसी कोई जिम्मेवारी नहीं है जिसके जरिए वे अपने कार्यकर्ताओं और जनता से सीधे संपर्क में रह सके। ऐसे में यादव ने सोशल मीडिया का सहारा लिया है। इसके सहारे ही वो कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पहचान बरकरार रखने का प्रयास कर रहे हैं।
वहीं अगले नेता की बात करें तो केन्द्र सरकार में मंत्री रह चुके कांतिलाल भूरिया भी उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्हें खुद को स्थापित करने के लिए विशेष प्रयास करने पड़ रहे हैं। वैसै भूरिया पीसीसी चीफ रहे हैं, लेकिन अब पार्टी नेतृत्व के सामने उनको अपना वजूद सिद्ध करने का संकट है। वैसे उनके विधायक पुत्र विक्रात भूरिया राहुल पिता के राजनैतिक करियर को आगे बढ़ा रहे है, लेकिन उनके सक्रिय रहने की भी जरुरत है।
बात अगले नेता की करें तो नेता प्रतिपक्ष रहे गोविन्द सिंह को भी इस दिशा में काम करना पड़ रहा है। वे चंबल ग्वालियर संभाग सहित प्रदेश भर में जाने माने चेहरा रहे हैं। पिछला विधानसभा चुनाव हारने के बाद ही वे अचानक से गायब हो गए। इस समय उनके पास भी ऐसी कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं है, कि जिससे वे कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद कर सकें।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ऐसा करना नेताओं की मजबूरी भी है, क्योंकि आला कमान हर नेता की गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं। दिल्ली में प्रदेश को लेकर हुई बैठक में भी एक बात साफ कर दी गई है कि जो नेता मैदान में नहीं दिखेंगे, उनके विकल्प की तलाश की जाएगी। अब ऐसे वजूद का खोने का डर कहें या फिर से खुद को साबित करने की चुनौती कुछ भी माना जा सकता है।

