भोजशाला पर खिलजी के हमले के 700 साल: 271 वर्षों तक ज्ञान का केंद्र रही, बार-बार तोड़ी गई, पहचान की लड़ाई आज भी जारी

Thursday, Jan 22, 2026-05:09 PM (IST)

भोपाल/धार: 23 जनवरी को बसंत पंचमी के अवसर पर एक बार फिर मध्यप्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला पर हालात तनावपूर्ण होते नजर आ रहे हैं। इस बार बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ रही है, जिस कारण हिंदू और मुस्लिम समाज की धार्मिक गतिविधियां एक ही दिन टकरा रही हैं। ऐसे में प्रशासन, न्यायपालिका और दोनों समुदायों की निगाहें भोजशाला पर टिकी हुई हैं।

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हिंदू संगठनों ने प्रशासन से पूरे दिन माता सरस्वती की पूजा-अर्चना की अनुमति मांगी है, जबकि मुस्लिम समाज शुक्रवार की नमाज अदा करने की तैयारी में है। हालात को देखते हुए प्रशासन ने भोजशाला परिसर और धार शहर में भारी सुरक्षा बल तैनात कर दिए हैं। इस बीच हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर बसंत पंचमी के दिन पूरे समय पूजा का अधिकार मांगा है। इस याचिका पर 22 जनवरी को सुनवाई होनी है, जिसके बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।

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पहले भी बन चुके हैं तनाव के हालात

भोजशाला में यह पहला मौका नहीं है जब बसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ पड़े हों। 2003, 2013 और 2016 तीनों वर्षों में जब ऐसा संयोग बना, तब धार में गंभीर तनाव और कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हुई थी। 2013 में हालात इतने बिगड़ गए थे कि पुलिस को हवाई फायरिंग और लाठीचार्ज करना पड़ा था। इसी अनुभव को देखते हुए इस बार प्रशासन किसी भी स्थिति से निपटने के लिए अलर्ट मोड में है।

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करीब
990 साल पुराना इतिहास, ज्ञान का महान केंद्र रही भोजशाला

  • 1034 ईस्वी में परमार शासक राजा भोज ने ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भोजशाला का निर्माण कराया।
  • यहां मां वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा स्थापित की गई।
  • भोजशाला नालंदा और तक्षशिला की तर्ज पर एक विशाल शैक्षणिक और सांस्कृतिक केंद्र थी।

यहां माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भामह, भास्कर भट्ट, धनपाल और मान्तृगुप्त जैसे महान विद्वानों ने अध्ययन और अध्यापन किया। 1035 ईस्वी में वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई।

271 वर्षों तक ज्ञान का केंद्र, फिर शुरू हुआ विध्वंस का दौर
स्थापना के बाद करीब 271 वर्षों तक भोजशाला ज्ञान और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनी रही, लेकिन 14वीं सदी में हालात बदल गए।

  • 1269 ई. में अरब मूल के कमाल मौलाना धार आकर बसे।
  • 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर आक्रमण कर इस्लामी राज्य की स्थापना की।
  • इस दौरान भोजशाला समेत कई मंदिरों और ऐतिहासिक स्थलों को ध्वस्त किया गया।
  • दिलावर खां गौरी ने विजय मंदिर को नष्ट किया।
  • 1514 ई. में महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने भोजशाला को मस्जिद में बदलने की कोशिश की।

151 साल से ब्रिटिश म्यूजियम में मां वाग्देवी की प्रतिमा

  • 1875 में अंग्रेजों के शासनकाल में भोपाल के पॉलिटिकल एजेंट मेजर किंकेड ने भोजशाला में खुदाई करवाई।
  • कहा जाता है कि मां वाग्देवी की प्रतिमा को जमीन से निकालकर ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन ले जाया गया, जहां वह आज भी रखी है।
  • 1961 में पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर स्वयं लंदन गए और प्रतिमा को धार की मां वाग्देवी के रूप में प्रमाणित किया।

आजादी के बाद भी जारी रहा संघर्ष

  • 1936 से 1942 तक नमाज पढ़ने को लेकर संघर्ष चला।
  • 1942 में धार रियासत के राजा ने मुस्लिम समाज को अलग स्थान पर मस्जिद के लिए जमीन दी।
  • 1952 से हर बसंत पंचमी पर भोज उत्सव और सांस्कृतिक आयोजन शुरू हुए।
  • 1977 के बाद भोजशाला परिसर में नमाज की शुरुआत हुई।

1995 से प्रशासनिक और कानूनी लड़ाई

  • 1995 में दो पक्षों के बीच विवाद के बाद मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई।
  • 1997 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के आदेश पर आम लोगों की एंट्री रोकी गई।
  • 1998 में ASI ने परिसर में प्रवेश पर रोक लगा दी।
  • 2003 में फिर पूजा की अनुमति दी गई, लेकिन हिंसा भड़क उठी।
  • 2013 और 2016 में बसंत पंचमी–शुक्रवार संयोग पर हालात बिगड़े।

कोर्ट में क्या है भोजशाला का स्टेटस 

  • 1 मई 2022 को हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
  • 11 मार्च 2024 को इंदौर हाईकोर्ट ने ASI को साइंटिफिक सर्वे का आदेश दिया।
  • ASI ने GPR (ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार) और कार्बन डेटिंग तकनीक का उपयोग किया।
  • 15 जुलाई 2024 को रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश की गई।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

  • मुस्लिम पक्ष ने 16 मार्च 2024 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
  • सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे पर रोक नहीं लगाई, लेकिन रिपोर्ट के आधार पर फैसला लेने पर रोक लगा दी।
  • रिपोर्ट को सार्वजनिक न करने के निर्देश दिए गए।

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अब फिर क्यों अहम है
23 जनवरी

बसंत पंचमी 2026 को शुक्रवार पड़ने से एक बार फिर धार्मिक अधिकारों का टकराव सामने है। एक ओर पूजा के अधिकार की मांग, दूसरी ओर नमाज बीच में प्रशासन और न्यायपालिका। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और प्रशासनिक फैसले पर टिकी हैं। यह तय करेगा कि भोजशाला में यह बसंत पंचमी शांति का संदेश देगी या फिर इतिहास खुद को दोहराएगा।

 


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Content Editor

Vikas Tiwari

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