कमलनाथ सरकार कैसे गिरी? दिग्विजय सिंह ने सिंधिया को लेकर किया बड़ा खुलासा, बताई अंदरूनी कहानी
Monday, Oct 12, 2026-01:22 PM (IST)
भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में 2020 में हुए सत्ता परिवर्तन की कहानी एक बार फिर चर्चा में है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ सरकार गिरने के पीछे की परिस्थितियों को लेकर कई अहम दावे किए हैं। उनके मुताबिक, तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच मुख्यमंत्री पद, दिल्ली स्थित सरकारी बंगले और अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर मतभेद गहराते चले गए थे। दिग्विजय का आरोप है कि इन विवादों को समय रहते सुलझाया जा सकता था, लेकिन आपसी खींचतान के कारण कांग्रेस की सरकार संकट में आ गई।
उज्जैन से अयोध्या तक सत्य, सनातन और स्वाभिमान यात्रा निकालने की तैयारी कर रहे दिग्विजय सिंह ने बताया कि 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद ही नेतृत्व को लेकर खींचतान शुरू हो गई थी। उनके अनुसार, ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, जबकि पार्टी के भीतर कमलनाथ को इस पद के लिए मजबूत समर्थन हासिल था। दिग्विजय का दावा है कि उन्होंने सिंधिया को समझाया था कि उनके समर्थन में पर्याप्त विधायक नहीं हैं और कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला हो चुका है।
दिग्विजय सिंह के मुताबिक, उस समय कमलनाथ ने सिंधिया को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने और उनके खेमे से किसी नेता को उपमुख्यमंत्री पद देने का विकल्प भी सुझाया था। हालांकि, सिंधिया की पसंद अलग थी। दिग्विजय का कहना है कि सिंधिया चाहते थे कि तुलसी सिलावट को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाए और गोविंद सिंह राजपूत या किसी अन्य नेता को उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिले। इसी मुद्दे के बाद दोनों नेताओं के बीच मतभेद और बढ़ गए।
मध्यस्थता की कोशिशें भी नहीं आईं काम
दिग्विजय सिंह ने बताया कि विवाद बढ़ने पर उन्होंने खुद हस्तक्षेप किया और सिंधिया से बातचीत की कोशिश की। उनके अनुसार, शोभना भरतिया के माध्यम से भी दोनों पक्षों के बीच संवाद कराने का प्रयास हुआ। दिग्विजय ने सिंधिया से उनकी नाराजगी का कारण पूछा तो सिंधिया ने कथित तौर पर कहा कि उन्हें दिग्विजय से नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री कमलनाथ से शिकायत है।
इस बीच 2019 के लोकसभा चुनाव में सिंधिया को हार का सामना करना पड़ा। दिग्विजय के दावे के मुताबिक, दिल्ली के सफदरजंग रोड स्थित सरकारी बंगले को लेकर भी विवाद सामने आया। यह बंगला सिंधिया परिवार से जुड़ा रहा था और ज्योतिरादित्य सिंधिया इसे अपने पास रखना चाहते थे। लेकिन कमलनाथ ने उनकी मांग स्वीकार नहीं की। दिग्विजय का कहना है कि इस घटनाक्रम ने पहले से जारी नाराजगी को और बढ़ा दिया।
ग्वालियर-चंबल में अफसरों की नियुक्तियों पर भी खींचतान
पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार के भीतर मतभेद की एक और वजह अधिकारियों की नियुक्तियों को बताया। उनके मुताबिक, ग्वालियर संभाग में कलेक्टर, कमिश्नर, डीआईजी और आईजी जैसे पदों पर नियुक्तियों को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी। इस विवाद को सुलझाने के लिए अधिकारियों की एक सूची तैयार की गई, जिसे मुख्यमंत्री के पास भेजा गया। दिग्विजय का दावा है कि सूची भेजे जाने के बावजूद करीब दो महीने तक आदेश जारी नहीं हुए।
उन्होंने बताया कि इस दौरान उन्होंने कमलनाथ से सरकार बचाने के लिए विवादों को पीछे छोड़ने और जरूरी फैसले लेने की अपील भी की थी। दिग्विजय के अनुसार, कमलनाथ ने सूची में शामिल कुछ अधिकारियों की योग्यता पर सवाल उठाए और तत्काल आदेश जारी करने से सहमति नहीं जताई। इसी खींचतान के बीच हालात लगातार बिगड़ते गए।
2020 में बदल गई थी मध्य प्रदेश की सत्ता
मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। उनके साथ कई विधायकों के पाला बदलने के बाद कमलनाथ सरकार बहुमत के संकट में आ गई और अंततः मुख्यमंत्री को पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी।
दिग्विजय सिंह ने अब इन घटनाओं को याद करते हुए दावा किया है कि यदि समय रहते नेतृत्व, बंगले और प्रशासनिक नियुक्तियों से जुड़े विवाद सुलझा लिए जाते, तो सरकार को बचाने की संभावना बन सकती थी। हालांकि, उनके बयान में लगाए गए आरोपों और घटनाक्रम की इस व्याख्या को दिग्विजय सिंह के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। सत्ता परिवर्तन के पीछे राजनीतिक समीकरण, विधायकों की भूमिका और कांग्रेस के भीतर मतभेद भी अहम रहे थे।

