आस्था या बर्बादी? सीहोर में 11,000 लीटर दूध नदी में बहाने पर मचा बवाल
Sunday, Apr 12, 2026-07:37 PM (IST)
सीहोर: मध्य प्रदेश के सीहोर में स्थित Sehore से सामने आया एक वीडियो और घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। यहां पातालेश्वर महादेव मंदिर में आयोजित एक धार्मिक ‘महाअभिषेक’ के दौरान लगभग 11 हजार लीटर दूध Narmada River में अर्पित कर दिया गया। इस आयोजन का नेतृत्व कथित रूप से बाबा शिवानंद महाराज द्वारा किया गया, जिसके बाद यह मामला सोशल मीडिया से लेकर आम जनचर्चा तक छा गया है।
जहां एक वर्ग इसे गहरी आस्था और धार्मिक परंपरा का हिस्सा बता रहा है, वहीं दूसरी ओर इस पर गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि जब प्रदेश में लाखों बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं, तब इतनी बड़ी मात्रा में दूध का इस तरह उपयोग होना क्या उचित है?
आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में करीब 10 लाख से अधिक बच्चे कुपोषण की समस्या से प्रभावित हैं, जिनमें एक बड़ी संख्या अति गंभीर स्थिति में है। ऐसे में 11 हजार लीटर दूध यदि जरूरतमंद बच्चों और आंगनवाड़ियों तक पहुंचता, तो हजारों जीवनों को पोषण मिल सकता था।
गणित के अनुसार, 11 हजार लीटर दूध से लगभग 44 हजार गिलास दूध तैयार हो सकते थे, जो कई बच्चों के लिए एक समय के भोजन की पूर्ति कर सकते थे। इसी कारण यह घटना केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक बहस का मुद्दा बन गई है।
दूसरी ओर पर्यावरण विशेषज्ञों का भी कहना है कि बड़ी मात्रा में दूध का सीधे नदी में प्रवाहित होना जल प्रदूषण और जलीय जीवों पर भी असर डाल सकता है, जिससे पर्यावरणीय चिंता और बढ़ जाती है।
यह पूरा मामला अब एक बड़े सवाल को जन्म दे रहा है—क्या आस्था का प्रदर्शन संसाधनों की इस तरह बर्बादी को उचित ठहरा सकता है? या फिर धर्म का असली अर्थ सेवा, सहयोग और जरूरतमंदों की मदद में छिपा है? सीहोर की यह घटना अब केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि यह समाज को सोचने पर मजबूर करने वाली एक गहरी बहस बन चुकी है—आस्था और मानवता के बीच संतुलन आखिर कैसे तय हो?

