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मुझे CM बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं’… बालाघाट में 30 बच्चों की मौत के बाद अभिजीत दीपके का इस्तीफा, आखिर क्या है पूरा मामला?

Sunday, Sep 13, 2026-03:17 PM (IST)

भोपाल/बालाघाट। (इजहार खान): बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत के मामले को लेकर पहुंचे अभिजीत दीपके को मीडिया के सवालों का सामना करना पड़ा। दौरे में देरी और मामले को लेकर उनसे कई सवाल किए गए। इसके बाद दीपके की टीम की ओर से भी सवाल उठाने के तरीके को लेकर नाराजगी जताई गई। इसी घटनाक्रम के बाद अभिजीत दीपके ने खुद को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बताते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का एक पत्र जारी किया। हालांकि पत्र के अंत में इसे स्पष्ट रूप से “satire” यानी व्यंग्य बताया गया है। यानी यह वास्तविक संवैधानिक इस्तीफा नहीं, बल्कि सरकार और मध्य प्रदेश के हालात पर तंज के तौर पर जारी किया गया पत्र है।

राज्यपाल को संबोधित पत्र में क्या लिखा?

दीपके ने पत्र में बालाघाट में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत का जिक्र करते हुए स्वास्थ्य व्यवस्था, पेयजल और शिक्षा को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि बच्चों को समय पर चिकित्सा और जरूरी सहायता उपलब्ध कराने में विफलता की जिम्मेदारी लेते हुए वे इस पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं समझते। पत्र में उन्होंने आदिवासी परिवारों के लिए मुआवजे, स्वास्थ्य अधिकारियों की जवाबदेही और कई गांवों में पेयजल तथा स्कूलों की स्थिति को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। दीपके ने मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय की स्थिति से जुड़े कुछ आंकड़ों का भी उल्लेख किया और 2003 के बाद से BJP सरकारों पर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में विफल रहने का आरोप लगाया।

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बड़ा सवाल-जब मुख्यमंत्री हैं ही नहीं, तो इस्तीफा किस पद से?

दीपके के इस पोस्ट के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या कोई व्यक्ति संवैधानिक पद पर न रहते हुए उस पद के नाम से इस्तीफा पत्र जारी कर सकता है? मध्य प्रदेश के वास्तविक मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हैं। इसलिए दीपके द्वारा जारी पत्र का कोई संवैधानिक इस्तीफा प्रभाव नहीं है। पत्र पर “satire” लिखा होना भी इसे एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक टिप्पणी के तौर पर पेश करता है।हालांकि, पत्र में सरकारी लेटरहेड जैसी प्रस्तुति और राज्यपाल को संबोधित किए जाने को लेकर अब राजनीतिक और कानूनी चर्चा शुरू हो गई है।

बालाघाट का मुद्दा बना बहस का केंद्र

एक तरफ दीपके ने अपने पत्र के जरिए आदिवासी बच्चों की मौत और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सरकार को घेरा है, वहीं दूसरी तरफ उनके ‘मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे’ ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। मुद्दा गंभीर है, इस्तीफा व्यंग्यात्मक है-लेकिन सवाल संवैधानिक पद की गरिमा और उसके नाम के इस्तेमाल को लेकर उठ रहे हैं।


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Content Editor

Himansh sharma

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