बड़ा घोटाला: किसानों ने नहीं लिया लोन, फिर भी कर्ज माफ बताकर निकाल लिए 1.5 करोड़ रुपए

3/25/2021 1:24:08 PM

झाबुआ (जावेद खान): भारतवर्ष की स्वतंत्रता के बाद देश ने अर्थव्यवस्था के समाजवादी मॉडल को अपनाया था। समयानुसार इस मॉडल के उपकरण के रूप में सहकारिता के तंत्र को अपनाया गया। इसके पीछे मंशा यह थी कि आम आदमी और किसानों की भी अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी हो। जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो सके। इस तंत्र को साकार करने के लिए देशभर में सहकारी संस्थाओं, समितियों व बैंकों की स्थापना की गई। प्रारंभिक दौर में सहकार का यह कार्य अपनी भावना के अनुरूप कार्य करता रहा, परंतु बाद के दशकों में यह सहकारी संस्थान राजनीति में पदार्पण करने वाले नेताओं और भ्रष्टाचार के ठिकाने बन गए।

इन संस्थाओं में सहकारिता के नाम पर खूब लूट-खसोट होने लगी और भ्रष्ट नेताओं व अधिकारियों ने इनमें काम करते हुए दोनों हाथों से आम आदमी व किसानों की कमाई बटोरी। जिस प्रकार जिले में सहकारी संस्थाओं के संसाधनों का निजी हित में दोहन किया गया, उसके कुछ उदाहरण पिछले दिनों मीडिया के माध्यम से झाबुआ जिले की थांदला सोसायटी में देखे गए। थांदला सोसायटी में ऑडिट के दौरान सामने आई गड़बड़ियों में पता चला कि जिन किसानों ने लोन नहीं लिया, उनका कर्ज माफ बताकर 1.5 करोड़ रुपए निकाले गए। सहकारिता के उपायुक्त अंबरीष वैद्य के अनुसार विशेष ऑडिट के दौरान यह राशि और कई गुना बढ़ सकती है। उनका विभाग सोसायटी के मैनेजर पवन दीक्षित पर एफआईआर भी करवाएगा। साथ ही वैद्य ने थांदला क्षेत्र की सोसायटियों का ताबड़तोड़ दौरा कर उनके रिकॉर्ड्स भी जब्त कर लिए हैं। अब अधिकारी किसानों से बात कर यह पूछेंगे कि उन्होंने लोन लिया था या नहीं। तो वहीं सहकारी बैंक की थांदला शाखा, जो कि काफी समय से विवादित रही है। नेताओं के संरक्षण में बैंक कैडर से बाहर मैनेजरों की नियुक्तियां की गई थी। इनके कोई सेवा नियम नहीं थे। सेल्समैन और सोसायटी मैनेजरों की वफादार टीम तैयार की गई। सहकारी संस्थाओं और सोसायटी विक्रेताओं को नेताओं का भरपूर आशीर्वाद मिलता है। ऐसे में मनमानी करने वाले कर्मचारियों पर कार्रवाई न करने के लिए अधिकारियों पर दबाव तक बनाया जाता है। तो वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक थांदला को लेकर सहकारिता में एक और घोटाले की खबर को छाप कर सहकारिता के दलालों को उजागर करने का काम किया। इस खबर का आधार यह था कि पूर्व बैंक अध्यक्ष गौरसिंह वसुनिया की शिकायत पर लोनमाफी में गड़बड़ करने वालों का भांडा फूटा। इसमें थांदला के सोसायटी मैनेजर, नागरिक सहकारी बैंक मैनेजर और सोसायटी के अन्य कर्मचारियों के नाम भी ऋणमाफी योजना के हितग्राहियों में शामिल है। जबकि शासन के निर्देश है कि जो व्यक्ति शासकीय सेवा में है, उसका कृषि ऋण माफ नहीं हो सकता है। गौरसिंह वसुनिया का कहना भी है कि वह जांच के बाद इस मामले की शिकायत सहकारिता मंत्री और मुख्यमंत्री से करेंगे।  

सहकारिता में घोटालों की बानगी इन दलालों की खुलती पोल से आपने देखी होगी। इसी को आधार बनाकर पूरे जिले के सहकारी नेताओं और कर्मचारियों की अकूत संपत्ति की जांच की जाना चाहिए क्योंकि जिन लोगों के पास 10-15 साल पहले मोटरसाइकिल में पेट्रोल भरवाने के पैसे भी नहीं थे, वह लोग करोड़ों रूपए के मालिक बन बैठे है।प्रदेश के बाहर से आए लोगों ने जुगाड़ से सहकारिता में नौकरी हासिल कर ली और आज करोड़पति है।जबकि वह आम आदमी या किसान जिसके लिए सहकारिता का यह उपक्रम बना है वह आज भी कर्ज में दबा है और सरकारों की ऋणमाफी की राह देख रहा है। सहकारिता के अधिकारियों को भी थांदला में हुई गड़बड़ियों को आधार बनाकर पूरे जिले में इस तरह की जांच करवाना चाहिए ताकि सरकार की मंशा पर पानी फेरने वाले यह कर्मचारी और उनके संरक्षक नेताओं की असलियत लोगों के सामने आ सके। निजीकरण की इस गलाकाट प्रतियोगिता में सहकारिता का विचार आज भी एक नेक और आम आदमी की बेहतरी का विचार है, मगर इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसको संचालित करने वालों की मंशा और आचरण कैसे हैं। अगर सहकारी संस्थानों में बुरी मंशा और भ्रष्ट आचरण वाले लोग घुस आए हैं तो उनकी सतत निगरानी करना और उन्हें बाहर निकालना सरकार की जिम्मेदारी है। साथ ही जिले में हुए इस खेल में केवल एकाध छोटी मछली के फंस जाने भर से ही पूरे तालाब के साफ होने की उम्मीद करना बेमानी है। सहकारिता के दलदल में फंसे भ्रष्टाचारी कीड़े तब तक कुलबुलाते रहेंगे, जब तक समूचे तंत्र की गहराई से सफाई नहीं की जाती है।


Content Writer

Vikas Tiwari

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