राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाले सुल्तान सिंह का निधन, इलाके में शोक की लहर
Friday, Feb 27, 2026-12:34 PM (IST)
रायपुर: पंचायत से लेकर राष्ट्रपति पद तक चुनाव लड़ने का साहस हर किसी में नहीं होता, लेकिन सुल्तान सिंह ने यह कर दिखाया। लेकिन अब यह हस्ति सदा सदा के लिए दुनिया को अलविदा कह गई। वे पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन से क्षेत्र में शोक की लहर है।
जी हां 80 और 90 के दशक में सुल्तान सिंह अपनी अनोखी शैली और जुझारू व्यक्तित्व के कारण दूर-दूर तक पहचाने जाने वाले सुल्तान सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे। भले ही उन्हें किसी भी चुनाव में जीत न मिली हो, पर उनका आत्मविश्वास कभी डगमगाया नहीं। बुलेट की धक-धक आवाज, मूंछों पर ताव और बेबाक अंदाज ने उन्हें क्षेत्र की एक अलग पहचान दिलाई।
पंच से राष्ट्रपति पद तक का सफर
सुल्तान सिंह ने स्थानीय निकाय से लेकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक किस्मत आजमाई। उन्होंने छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और बिहार से भी चुनाव लड़ा। वे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे, वहीं कई बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भी जनता के बीच पहुंचे। बताया जाता है कि मुलायम सिंह यादव से उनके अच्छे संबंध थे। राजिम विधानसभा चुनाव में उन्हें ‘बकरी छाप’ चुनाव चिह्न मिला था, जिसके साथ उन्होंने जोरदार प्रचार किया, हालांकि उनके हिस्से में जीत नहीं आई।
राजनीति जुनून थी, केवल शौक नहीं
सुल्तान सिंह ने स्वयं पंच का चुनाव भी लड़ा, पर सफलता नहीं मिली। इसके विपरीत वे अपनी पत्नी को सरपंच बनाने में कामयाब रहे, जिसे वे अपनी बड़ी उपलब्धि मानते थे। उनके करीबी बताते हैं कि राजनीति की गहरी समझ और जमीनी पकड़ उनकी खासियत थी। अजीत जोगी और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं से भी उनके संबंध रहे। स्थानीय लोगों के अनुसार वे निडर, स्पष्टवादी और ईमानदार छवि के धनी थे।
पैरी नदी किनारे अंतिम विदाई
गुरुवार को शहर से लगे ग्राम चौबेबंधा में पैरी नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार किया गया। वे कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन की खबर से क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई। बड़ी संख्या में ग्रामीणों और समर्थकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। चुनावी हार के बावजूद लोगों के दिलों में जगह बनाना ही उनकी सबसे बड़ी जीत मानी जा रही है।

