राजा देवव्रत सिंह की जयंती आज, लोगों ने श्रद्धा और सम्मान के साथ किया याद; बोले- जनता के दिलों के राजा थे
Wednesday, Jun 03, 2026-12:31 PM (IST)
खैरागढ़ (श्रेयांश सिंह): राजनीति में समय के साथ चेहरे बदलते हैं, दल बदलते हैं और समीकरण भी बदल जाते हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो पद और सत्ता की सीमाओं से आगे निकलकर लोगों के दिलों में स्थायी जगह बना लेते हैं। खैरागढ़ के स्वर्गीय राजा देवव्रत सिंह ऐसा ही एक नाम हैं, जिनकी जयंती पर आज पूरा क्षेत्र उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ याद कर रहा है।
खैरागढ़ की राजनीतिक विरासत में राजा देवव्रत सिंह का नाम केवल एक विधायक या सांसद के रूप में दर्ज नहीं है, बल्कि एक ऐसे जननेता के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने राजनीति को जनता से जोड़ने का काम किया। राजघराने में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपनी पहचान राजसी ठाठ-बाट से नहीं, बल्कि गांवों की चौपालों, किसानों के खेतों और आम लोगों के बीच बनाई। यही कारण था कि लोग उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि अपने परिवार का सदस्य मानते थे।
राजा साहब जहां भी जाते, वहां भीड़ किसी राजनीतिक कार्यक्रम की नहीं बल्कि आत्मीय मुलाकात की तरह दिखाई देती थी। किसी किसान की फसल की चिंता हो, किसी गरीब परिवार का दुख हो या किसी सामाजिक आयोजन का निमंत्रण, वे हर वर्ग के लोगों के बीच सहज रूप से पहुंच जाते थे। लोगों को यह भरोसा रहता था कि उनकी बात सीधे राजा साहब तक पहुंचेगी और उसे गंभीरता से सुना जाएगा।
उनका राजनीतिक सफर भी उतना ही प्रभावशाली रहा। उन्होंने चार बार विधायक और एक बार सांसद के रूप में जनता का प्रतिनिधित्व किया। कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में उनकी अलग पहचान रही। बदलते राजनीतिक हालातों में उन्होंने नई राजनीतिक राह भी चुनी, लेकिन जनता के साथ उनका रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ा। इसका सबसे बड़ा प्रमाण वर्ष 2018 का विधानसभा चुनाव रहा, जब जनता ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताते हुए उन्हें विधानसभा भेजा।
राजनीति में अक्सर जनाधार पद और पार्टी के साथ जुड़ा माना जाता है, लेकिन राजा देवव्रत सिंह का जनाधार उनकी व्यक्तिगत छवि और जनता से उनके रिश्तों पर टिका था। यही वजह थी कि वे जहां भी रहे, लोगों का समर्थन और सम्मान उनके साथ बना रहा। उनके समर्थक आज भी बताते हैं कि राजा साहब के दरवाजे आम लोगों के लिए हमेशा खुले रहते थे और वे समस्याओं को सुनने के लिए कभी समय नहीं देखते थे।
4 नवंबर 2021 को जब उनके निधन की खबर आई तो खैरागढ़ सहित पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई थी। लोगों को ऐसा लगा मानो राजनीति का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया हो, जिसमें रिश्ते, संवेदनाएं और अपनापन सबसे बड़ी ताकत हुआ करते थे। उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ी भीड़ ने यह साबित कर दिया था कि राजा साहब केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि लाखों लोगों की भावनाओं से जुड़े हुए थे।
आज उनकी जयंती पर जब लोग उन्हें याद कर रहे हैं तो केवल उनके राजनीतिक योगदान की चर्चा नहीं हो रही, बल्कि उस व्यक्तित्व को याद किया जा रहा है जिसने जनता के साथ आत्मीय संबंधों को अपनी सबसे बड़ी पूंजी बनाया। खैरागढ़ की चौपालों, चाय की दुकानों और ग्रामीण बैठकों में आज भी जब राजनीति की बात होती है, तो राजा देवव्रत सिंह का नाम सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है।
सत्ता बदली, सरकारें बदलीं, राजनीतिक दौर भी बदल गए, लेकिन खैरागढ़ की जनता के दिलों में बसे राजा साहब की याद आज भी वैसी ही है। शायद यही किसी जननेता की सबसे बड़ी पहचान होती है कि उसके जाने के वर्षों बाद भी लोग उसे केवल याद नहीं करते, बल्कि अपने दिलों में जीवित रखते हैं।

