डिप्टी कलेक्टर समेत 5 पर लटकी तलवार! हो सकता है बड़ा एक्शन, अग्रिम जमानत याचिका खारिज
Thursday, Apr 09, 2026-05:54 PM (IST)
भोपाल : मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में आदिवासी महिला की जमीन हड़पने से जुड़ा एक बेहद चर्चित और गंभीर मामला सामने आया है। इस प्रकरण में विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) एक्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि प्रथम दृष्टया मामले में गंभीर अपराध के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं और यह मामला अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत आता है, इसलिए आरोपियों को अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता।
फर्जी लेनदेन के जरिए जमीन हड़पने की साजिश
जांच में यह सामने आया कि आरोपियों ने जमीन हड़पने के लिए सुनियोजित तरीके से फर्जी लेनदेन का सहारा लिया। लेनदेने सिर्फ कागजों में हुआ। मृतक जगोला की जमीन को राजाराम के नाम स्थानांतरित कराने के लिए बैंक खाते के माध्यम से लेनदेन का दिखावा किया गया। राजाराम के नाम से संव्यवहार से महज चार दिन पहले बैंक खाता खुलवाया गया और राशि का हस्तांतरण दिखाकर बाद में वही रकम वापस अन्य खातों में भेज दी गई। इससे यह साफ होता है कि पूरा लेनदेन केवल कागजी औपचारिकता के लिए किया गया था।
प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत?
मामले में तत्कालीन तहसीलदार और वर्तमान डिप्टी कलेक्टर डॉ. बबीता राठौर की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि उन्होंने बिना आवश्यक दस्तावेजों की जांच किए भूमि का नामांतरण कर दिया। न तो मृतक की वंशावली (सिजरा) की पुष्टि की गई और न ही मृत्यु प्रमाण पत्र लिया गया। इसके बावजूद राजाराम को मृतक का उत्तराधिकारी मानते हुए जमीन उसके नाम कर दी गई, जिससे यह आशंका मजबूत होती है कि यह पूरी प्रक्रिया लापरवाही या सुनियोजित मिलीभगत का परिणाम हो सकती है।
न्यायालय का सख्त संदेश
न्यायालय ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि पद पर रहते हुए किए गए कार्यों को अपराध से अलग नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर डॉ. बबीता राठौर सहित अन्य आरोपियों मुन्ना कुशवाहा, धीरज तिवारी, श्रीराम शर्मा और अजय पटैरिया की अग्रिम जमानत याचिकाएं भी खारिज कर दी गईं। यह फैसला न केवल इस मामले में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि कानून के सामने कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद पर हो, जवाबदेही से बच नहीं सकता।

