चुनाव हारकर राजनीतिक हाशिए पर पहुंचे सिंधिया समर्थकों की क्या कांग्रेस में होगी वापसी? जानिए अंदरूनी सियासत का चौंकाने वाला सच
Saturday, Oct 31, 2026-04:44 PM (IST)
ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल संभाग की राजनीति में यह चर्चा अक्सर गरम रहती है कि क्या भविष्य के चुनावों से पहले केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक नेता दोबारा कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं? सोशल मीडिया के दावों और राजनीतिक गलियारों की सामान्य चर्चाओं से इतर, यदि जमीनी हकीकत और चुनावी इतिहास को खंगाला जाए, तो कहानी पूरी तरह अलग नजर आती है।
चुनाव हारने वाले सिंधिया समर्थकों की वर्तमान स्थिति
राजनीति के जानकारों के अनुसार, इस अफवाह के पीछे का एक बड़ा कारण वे नेता हैं जो सिंधिया के साथ वर्ष 2020 में भाजपा में तो आए, लेकिन उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी की बड़ी लहर के बावजूद अपनी सीट नहीं बचा सके। चुनाव हारने के बाद इनमें से अधिकांश नेता वर्तमान में राजनीतिक रूप से काफी हद तक निष्क्रिय दिखाई दे रहे हैं:
इमरती देवी (डबरा): अंचल की सबसे चर्चित सिंधिया समर्थक नेता, जिन्हें लगातार चुनावी झटके लगे हैं। वे संगठन में पद पाने और अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं और मुख्यधारा की सक्रिय राजनीति से दूर हैं।
महेंद्र सिंह सिसोदिया (बमोरी): सिंधिया सरकार में कद्दावर मंत्री रहे सिसोदिया विधानसभा का चुनाव हार गए। फिलहाल वे क्षेत्रीय कार्यक्रमों और भोपाल-दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में पहले की तरह सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं।
सुरेश धाकड़ राखेड़ा (पोहरी) व कमलेश जाटव (अंबाह): ये दोनों नेता भी चुनाव में शिकस्त खा गए। वर्तमान में इनकी राजनीतिक सक्रियता बहुत कम है और क्षेत्र में इनके प्रभाव में भारी कमी आई है।
रघुराज कंसाना (मुरैना) व जसपाल सिंह जज्जी (अशोकनगर): ये चेहरे भी विधानसभा चुनाव में हार का सामना करने के बाद संगठन के भीतर अपनी खोई हुई जमीन तलाश रहे हैं।
क्या ये हारे हुए नेता कांग्रेस में जाने की कोशिश कर रहे हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि जो सिंधिया समर्थक चुनाव हार गए हैं, उनके लिए विपक्षी दल के दरवाजे लगभग पूरी तरह बंद हैं, जिसके कारण उनके कांग्रेस में जाने की बातें केवल एक कोरी अफवाह हैं: कांग्रेस का कड़ा रुख: मध्य प्रदेश कांग्रेस का प्रांतीय नेतृत्व कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुका है कि वर्ष 2020 में लोकतांत्रिक सरकार को गिराने वाले चेहरों के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं है।
राजनीतिक प्रासंगिकता का संकट: चुनावी हार के बाद इन नेताओं की सांगठनिक 'बार्गेनिंग पावर' (सौदेबाजी की ताकत) कमजोर हुई है। विपक्षी दल भी केवल उन्हीं नेताओं में दिलचस्पी रखता है जिनके पास मजबूत जनाधार बचा हो। हारे हुए और निष्क्रिय चल रहे नेताओं को वापस लेकर कांग्रेस अपने ही मूल कार्यकर्ताओं को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती।
दलबदल' नहीं, यह भाजपा के भीतर 'अस्तित्व' की लड़ाई है
बाहरी तौर पर जिसे "कांग्रेस में जाने की तैयारी" का नाम देकर अफवाह फैलाई जाती है, वह असल में भाजपा के अंदरूनी ढांचे में 'मूल भाजपा' बनाम 'सिंधिया समर्थक' के बीच अपने राजनैतिक वजूद को बचाए रखने का आंतरिक संघर्ष है:
मूल बनाम नए का द्वंद्व:
ग्वालियर-चंबल में भाजपा संगठन के भीतर आज भी पुरानी भाजपा के नेताओं (जैसे स्थानीय सांसद और पुराने विधायक) और सिंधिया गुट के बीच वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। हाल ही के महीनों में ग्वालियर में कार्यक्रमों की रूपरेखा और अतिथि सूची को लेकर स्थानीय नेताओं और सिंधिया समर्थकों के बीच खींचतान सार्वजनिक भी हो चुकी है।
पदों के लिए दबाव की राजनीति: जो नेता चुनाव हार चुके हैं, वे केवल इस कोशिश में लगे हैं कि भाजपा संगठन के भीतर उन्हें किसी तरह निगम-मंडलों में नियुक्तियां या सांगठनिक पद मिल जाएं। इस आंतरिक असंतोष और अपनी ही पार्टी में दबाव बनाने की रणनीति को विरोधी दल 'कांग्रेस वापसी की कोशिश' का रूप देकर प्रचारित करते हैं।

