बिना पेनिट्रेशन प्राइवेट पार्ट रगड़ना रेप नहीं, रेप की कोशिश- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
Wednesday, Feb 18, 2026-05:55 PM (IST)
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रेप के मामले में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट के मुताबिक, पुरुष द्वारा अपना प्राइवेट पार्ट महिला के वजाइना के ऊपर रगड़ना और बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेट करना यह IPC की धारा 375 के तहत 'रेप' नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह रेप अटेंप्ट यानी 'रेप की कोशिश' में आएगा। मेडिकल साक्ष्यों में पीड़िता का हाइमन (Hymen) सुरक्षित पाए जाने पर कोर्ट ने दोषी की सजा को संशोधित करते हुए सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दिया है।
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ ने सोमवार 16 फरवरी को अपीलकर्ता की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए रेप की सजा को रेप की कोशिश में बदलते हुए यह फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि हालांकि आरोपी का इरादा स्पष्ट था, लेकिन पूर्ण पेनेट्रेशन के अभाव में यह कृत्य रेप में नहीं आता। बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन रेप करने की कोशिश है, असल में रेप नहीं। रेप सिद्ध करने के लिए सबूत मौजूद होने चाहिए।
क्या है पूरा मामला
घटना 21.05.2004 की है। अपील करने वाला विक्टिम (लड़की) को ज़बरदस्ती अपने घर ले गया, जहां उसने दोनों के कपड़े उतार दिए और उसकी मर्ज़ी के बिना सेक्स किया और उसके बाद उसने उसे अपने घर के कमरे में बंद कर दिया, उसके हाथ-पैर बांध दिए और उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया।
मामला दर्ज हुआ और उसके खिलाफ चार्जशीट फाइल की गई। धमतरी के एडिशनल सेशंस जज ने उसे IPC की धारा 376(1) और 342 के तहत दोषी पाया। सज़ा के आदेश और उसके तहत दी गई सज़ा को चुनौती देते हुए अपील करने वाले ने हाईकोर्ट में अपील की।
ट्रायल के दौरान, पीड़िता ने आरोप लगाए कि आरोपी ने (विक्टिम) अपना प्राइवेट पार्ट उसकी वजाइना में डाला। हालांकि, बाद में उसने कहा कि अपील करने वाले ने अपना प्राइवेट पार्ट लगभग 10 मिनट तक उसकी वजाइना के ऊपर रखा था, लेकिन डाला नहीं।
वहीं उसकी मेडिकल जांच में रेप की पुष्टि नहीं हुई लेकिन पीड़िता के अंडरगारमेंट से ह्यूमन स्पर्म मिला। इसी के आधार पर मेडिकल रिपोर्ट में थोड़ा पेनिट्रेशन संभावना जताई गई। क्योंकि पीड़िता ने अपने प्राइवेट पार्ट में दर्द की शिकायत की बात कही थी। जिसके आधार पर रेप की संभावना जताई गई। लेकिन पक्का कुछ नहीं कहा गया।
दोनों पक्षकारों को सुनने के बाद कोर्ट ने पीड़िता के अलग-अलग बयानों पर गौर किया। दोनों में अलग अलग बातें कहीं गई। एक में पेनिट्रेशन होना और दूसरे में कहा कि बिना पेनिट्रेशन किए सिर्फ़ 10 मिनट तक अपना प्राइवेट पार्ट उसकी वजाइना के ऊपर रखा।
जस्टिस व्यास के मुताबिक, रेप के जुर्म के लिए पेनेट्रेशन ज़रूरी था। उन्होंने आगे कहा– “IPC की धारा 376 के तहत सज़ा के लिए हल्का-सा पेनेट्रेशन भी काफ़ी है। लेकिन रेप के जुर्म के लिए पेनेट्रेशन जरूरी है और इसे साबित करने के लिए ठोस सबूत होने चाहिए। आरोपी ने रेप की कोशिश की, लेकिन रेप नहीं किया। इसलिए अपील करने वाले को IPC की धारा 376(1) के बजाय IPC की धारा 376/511 के तहत सज़ा के लायक जुर्म के लिए दोषी ठहराया गया।

