दतिया का ‘सियासी दगा’: फर्श से अर्श पर बिठाया जिन्हें, संकट में उन्हीं ने मोड़ी पीठ; ‘धनकुबेरों’ की चुप्पी पर समर्थकों का उबाल
Tuesday, Jul 14, 2026-01:37 PM (IST)
दतिया/डबरा: राजनीति में वफादारी की कसमें खाने और खाने का दौर पुराना हो चुका है। दतिया उपचुनाव के रण में जब पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों और कार्यकर्ताओं का हुजूम सड़कों पर उतरकर अपने नेता के अपमान का बदला लेने की हुंकार भर रहा था, तब दतिया और डबरा की राजनीति के वे ‘बड़े चेहरे’ कहीं नजर नहीं आए, जिन्हें डॉ. मिश्रा ने शून्य से उठाकर अरबपति और ‘धनकुबेर’ बनाया था।
मलाई के शौकीन, संकट में गुमनाम
कभी साइकिल पर चलने वाले और आज करोड़ों-अरबों के साम्राज्य के मालिक बने नेताओं की चुप्पी ने कार्यकर्ताओं के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है। दतिया में टिकट कटने की खबर आते ही जब सामान्य कार्यकर्ता हाईवे जाम कर अपने नेता के समर्थन में इस्तीफे दे रहे थे, तब वे कथित ‘दिग्गज’ नेता अपने पद और साम्राज्य को बचाने के लिए बिलों में दुबक गए।
जिन नामों की चर्चा दतिया से लेकर डबरा तक आम है, उनमें कौशल शर्मा एक बड़ा नाम
इसके साथ दामोदर गुप्ता उर्फ ‘चप्पा सेठ’, ब्रजमोहन गुर्जर और भीकम साहू जैसे नाम प्रमुख हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने नरोत्तम मिश्रा की छत्रछाया में राजनीतिक ऊंचाइयां छुईं, लेकिन आज जब ‘दादा’ के सम्मान की बारी आई, तो ये लोग अपने स्वार्थ के चश्मे से ही दुनिया देखते नजर आए।
वफादारी का ढोंग और ठहाकों का सौदा
सबसे अधिक आक्रोश डबरा के उन कार्यकर्ताओं में है जिन्होंने देखा कि कैसे जो नेता कल तक नरोत्तम मिश्रा की परिक्रमा करते थे, वे आज उनके विरोधी खेमे में जाकर खड़े हो गए हैं। कौशल शर्मा जैसे नेताओं का आशुतोष तिवारी का नामांकन दाखिल करवाने पहुंचना और उस इमरती देवी के साथ ठहाके लगाना, जो कल तक डॉ. मिश्रा के आंसू देखकर खुश हो रही थीं, यह साबित करता है कि इनकी निष्ठा ‘सिद्धांत’ के लिए नहीं, बल्कि ‘सुविधा’ के लिए थी।
अर्श’ के मुसाफिर, ‘फर्श’ के दगाबाज
एक तरफ वे निष्ठावान कार्यकर्ता हैं जिन्होंने बिना किसी लोभ के अपने पद से इस्तीफे दे दिए, और दूसरी तरफ ये ‘अवसरवादी’ गिरोह है जो मलाई चाटने के बाद अब अपनी त्वचा बचाने में लगा है। राजनीति के जानकार इसे ‘कृतघ्नता का चरम’ मान रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर चाय की चौपालों तक अब एक ही सवाल गूँज रहा है—जिन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिन्होंने दादा की बदौलत अपनी तिजोरियां भरीं, क्या उनकी यही ‘गुरु दक्षिणा’ है?
शब्दों में बयां करें तो क्या कहें...?
इन अवसरवादियों के लिए कोई एक शब्द छोटा पड़ रहा है। इन्हें ‘सियासी गिरगिट’ कहें या ‘आस्तीन के सांप’, ये ऐसे किरदार हैं जिन्होंने राजनीति की पवित्रता को अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की वेदी पर चढ़ा दिया है। जनता देख रही है, और आने वाला वक्त ही तय करेगा कि इन ‘धनकुबेरों’ की वफादारी की कीमत क्या होगी।

