27 महीने में 8 कलेक्टर और 7 SP हटे, फिर मिली मलाईदार पोस्ट, राज्य में ट्रांसफर पॉलिटिक्स चर्चा में आई
Saturday, Mar 28, 2026-05:30 PM (IST)
भोपाल: मध्य प्रदेश में पिछले कुछ समय से प्रशासनिक स्तर पर लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। बीते करीब 27 महीनों में राज्य सरकार ने कई जिलों में सख्त रुख अपनाते हुए कलेक्टर और पुलिस अधीक्षकों के तबादले और हटाने के फैसले लिए हैं। इन बदलावों को सरकार की ओर से जवाबदेही बढ़ाने और प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में उठाया गया कदम बताया जा रहा है।सूत्रों और प्रशासनिक हलकों के अनुसार, इस अवधि में कई जिलों में कार्यप्रणाली, जनशिकायतों और स्थानीय विवादों को आधार बनाकर अधिकारियों पर कार्रवाई की गई। खासतौर पर कुछ जिलों में कलेक्टरों को अचानक हटाए जाने के बाद यह संदेश दिया गया कि लापरवाही या जनहित से जुड़े मामलों में ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हालांकि, इन कार्रवाईयों के बीच एक और पहलू भी लगातार चर्चा में बना हुआ है। कई मामलों में देखा गया है कि जिन अधिकारियों को उनके पदों से हटाया गया, उन्हें कुछ ही समय बाद फिर से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों पर नियुक्त कर दिया गया। इससे प्रशासनिक हलकों में यह बहस शुरू हो गई है कि क्या ये बदलाव केवल सख्ती का संकेत हैं या इसके पीछे कोई संतुलन साधने की रणनीति भी काम कर रही है।कुछ उदाहरणों में ऐसे अधिकारी भी शामिल हैं जिन्हें विवाद या शिकायतों के चलते हटाया गया, लेकिन बाद में उन्हें निगम, बोर्ड या अन्य अहम संस्थानों में जिम्मेदारी दी गई। इसी तरह कुछ अफसरों को पहले ट्रांसफर कर कम महत्वपूर्ण माने जाने वाले पदों पर भेजा गया और बाद में फिर से प्रमुख जिलों में तैनात कर दिया गया।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह के लगातार फेरबदल से एक ओर जहां यह संकेत जाता है कि सरकार प्रशासन पर नियंत्रण बनाए रखना चाहती है, वहीं दूसरी ओर इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या स्थिरता की कमी के चलते नीतियों के क्रियान्वयन पर असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश में चल रहे इन प्रशासनिक बदलावों ने न केवल ब्यूरोक्रेसी में हलचल पैदा की है, बल्कि यह भी दिखाया है कि राज्य में अफसरों की पोस्टिंग और ट्रांसफर अब केवल सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक रणनीतिक और चर्चा का विषय बन चुकी है।

