MP में रातों-रात हटाए गए कई IPS अफसर, क्यों छीनी गई कप्तानी? जानिए पूरी कहानी..
Monday, May 04, 2026-12:38 PM (IST)
भोपालः मध्य प्रदेश में एक बार फिर प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। शनिवार देर रात सरकार ने 62 आईपीएस अधिकारियों के तबादले कर साफ संकेत दे दिया कि अब कप्तानी केवल कुर्सी नहीं, बल्कि जवाबदेही का पैमाना भी है। इस बड़े फेरबदल को सिर्फ रूटीन ट्रांसफर मानना भूल होगी - यह फैसला परफॉर्मेंस, विवाद और राजनीतिक समीकरणों का मिला-जुला संदेश देता है। सबसे ज्यादा चर्चा 2014 बैच की आईपीएस वाहनी सिंह के ट्रांसफर को लेकर है। डिंडौरी की एसपी रहीं सिंह को इंदौर पीटीसी भेजा गया है। वे उस एसआईटी का हिस्सा थीं, जिसने मंत्री विजय शाह के विवादित बयान की जांच की थी। ऐसे में उनका तबादला प्रशासनिक कार्रवाई से ज्यादा ‘टाइमिंग’ के कारण सवालों में है।
इसी तरह दमोह के एसपी श्रुतकीर्ति सोमवंशी को ग्वालियर भेजा गया। दिलचस्प यह है कि उनके आईएएस भाई स्वरोचिष सोमवंशी को हाल ही में सीधी से हटाया गया था। अब दोनों भाइयों के तबादले ने सिस्टम के भीतर चल रही सख्ती को उजागर कर दिया है। सिवनी के एसपी सुनील मेहता का हटना भी सामान्य नहीं माना जा रहा। उनके कार्यकाल में चर्चित हवाला डकैती कांड हुआ था, जिसने पूरे देश में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। हालांकि बाद में राहत मिली, लेकिन उस घटना की छाया अब तक बनी हुई थी।
खंडवा के आईपीएस मनोज कुमार राय का मामला प्रशासनिक सिस्टम की दूसरी सच्चाई सामने लाता है‘ मनपसंद पोस्टिंग’। लंबे समय से बड़े जिले की तलाश में लगे राय को आखिरकार पुलिस मुख्यालय भेज दिया गया। यह संदेश साफ है कि सिर्फ प्रयास नहीं, प्रदर्शन भी जरूरी है। इस फेरबदल में कई नए चेहरे भी उभरे हैं। सूरज कुमार वर्मा, यांगचेन डोलकर भुटिया, रजत सकलेचा जैसे अधिकारियों को नई जिम्मेदारियां मिली हैं।
खासतौर पर शिवपुरी में महिला आईपीएस भुटिया की तैनाती यह दर्शाती है कि सरकार अब संतुलन और छवि दोनों पर ध्यान दे रही है। सूत्रों की मानें तो कुछ तबादलों के पीछे स्थानीय शिकायतें और राजनीतिक दबाव भी कारण रहे। रीवा, शिवपुरी और नर्मदापुरम जैसे जिलों में बदलाव इसी ओर इशारा करते हैं। वहीं कुछ अफसरों को ‘इनाम’ के तौर पर बेहतर पोस्टिंग भी मिली है।
कुल मिलाकर यह ट्रांसफर लिस्ट केवल नामों का फेरबदल नहीं है, बल्कि सरकार का स्पष्ट संदेश है कि परफॉर्मेंस, छवि और नियंत्रण, तीनों पर अब सख्ती होगी। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ये नए ‘कप्तान’ मैदान में कितनी मजबूती से अपनी भूमिका निभाते हैं और सरकार की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरते हैं।

