राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस को किसने दिया धोखा? नटराजन का नामांकन रद्द होने के पीछे क्या अपनों ने ही खेला बड़ा खेल?
Wednesday, Jun 10, 2026-01:17 PM (IST)
भोपाल: मध्य प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव के दौरान जो कुछ हुआ, उसने कांग्रेस संगठन की कार्यप्रणाली और नेतृत्व क्षमता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होना केवल एक उम्मीदवार का चुनावी झटका नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा में मिली असफलता के रूप में देखा जा रहा है।जिस सीट को कांग्रेस लगभग सुनिश्चित मानकर चल रही थी, वह तकनीकी और रणनीतिक चूक के कारण हाथ से निकल गई। हैरानी की बात यह है कि जिस दस्तावेज और कानूनी विवाद के आधार पर नामांकन खारिज हुआ, उसकी जानकारी विपक्ष तक पहुंच गई, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व को इसकी भनक तक नहीं लगी। इससे संगठन की आंतरिक निगरानी और समन्वय व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि आखिर वह "घर का भेदी" कौन है, जिसने मीनाक्षी नटराजन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी बाहर पहुंचाई। भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय का दावा कि कांग्रेस से जुड़े लोगों ने ही दस्तावेज उपलब्ध कराए, इस पूरे घटनाक्रम को और रहस्यमय बना देता है। यदि इन दावों में सच्चाई है, तो यह केवल एक चुनावी हार नहीं, बल्कि कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी का सार्वजनिक प्रदर्शन है।
दिलचस्प यह भी है कि इस सीट के लिए पार्टी के भीतर कई दावेदारों की चर्चा रही थी। ऐसे में उम्मीदवार चयन के बाद असंतोष की खबरें लगातार सामने आती रहीं। कई नेताओं की चुप्पी और कुछ की दूरी ने भी राजनीतिक संकेत दिए। खासकर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की सीमित सक्रियता ने अटकलों को और हवा दी।
दिसंबर 2023 में प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालने वाले जीतू पटवारी के सामने संगठन को एकजुट करने की बड़ी चुनौती थी। लेकिन डेढ़-दो साल के कार्यकाल में गुटबाजी, असंतोष और रणनीतिक चूकों की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। मीनाक्षी नटराजन प्रकरण ने इन सभी सवालों को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांग्रेस इस हार से क्या सबक लेती है। क्या पार्टी आंतरिक मतभेदों को खत्म कर पाएगी, या फिर गुटबाजी आगे भी उसकी राजनीतिक संभावनाओं को नुकसान पहुंचाती रहेगी? राज्यसभा की यह सीट भले चली गई हो, लेकिन इस घटनाक्रम ने कांग्रेस संगठन के भीतर छिपी दरारों को जरूर उजागर कर दिया है। राजनीति में विरोधियों से लड़ना आसान होता है, लेकिन जब चुनौती अपने ही घर से मिले, तो हार अधिक पीड़ादायक और सवाल अधिक गंभीर हो जाते हैं।

