आरक्षक आत्महत्या के दुख में टूटे कांस्टेबल दोस्त ने बताई सिस्टम में बेबसी, घुटन और भेदभाव की कहानी,आरक्षक की औकात बता किया भावुक पोस्ट
Sunday, May 10, 2026-07:21 PM (IST)
छतरपुर( राजेश चौरसिया): छतरपुर में एक आरक्षक की आत्महत्या के बाद अब पुलिस विभाग के भीतर का दर्द और नाराजगी सोशल मीडिया पर खुलकर सामने आ गई है। एक पुलिसकर्मी द्वारा लिखी गई लंबी भावुक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें विभाग के भीतर “सम्मान में भेदभाव”, मानसिक तनाव, छुट्टी की समस्या, ट्रांसफर-सस्पेंशन की राजनीति और छोटे कर्मचारियों की उपेक्षा जैसे गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं।

मामला उस पुलिसकर्मी से जुड़ा है जिसने नौगांव की पुरानी चौकी में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। मृतक आरक्षक तरुण गंधर्व की मौत ने पूरे पुलिस महकमे को झकझोर दिया, लेकिन इसके बाद जो तस्वीर सामने आई उसने विभाग के अंदर ही असंतोष पैदा कर दिया।
सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट में थाना नौगांव के आरक्षक हरदेव कुशवाहा ने बेहद भावुक शब्दों में लिखा—
“अलविदा दोस्त तरुण…तू कहता था खुद से ज्यादा कोई महत्वपूर्ण नहीं, फिर ऐसा क्यों किया? आंखें बंद करता हूं तो वही पुरानी यादें सामने आ जाती हैं… भगवान अपने श्री चरणों में स्थान दें।”
इसके बाद पोस्ट में पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल खड़े किए गए। आरक्षक ने लिखा कि एक साल पहले जब छतरपुर कोतवाली के टीआई अरविंद कुजूर ने आत्महत्या की थी, तब उन्हें पूरे सम्मान के साथ ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया गया था। जिले के बड़े अधिकारी मौजूद रहे थे, लेकिन इस बार एक आरक्षक के शव को “पॉलीथिन में लपेटकर बॉक्स में घर भेज दिया गया।”

पोस्ट में सवाल पूछा गया..
“क्या उसने खाकी नहीं पहनी थी? क्या उसके माथे पर अशोक चिन्ह नहीं था? क्या आरक्षक की कोई औकात नहीं?”
“छोटे कर्मचारी की सुनवाई नहीं होती”
वायरल पोस्ट में पुलिस विभाग के निचले स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियों की परेशानियों को विस्तार से बताया गया। लिखा गया कि यदि कोई कर्मचारी अपनी समस्या लेकर अधिकारियों के पास जाता है तो घंटों इंतजार करना पड़ता है। वहीं थाने से लगातार ड्यूटी पर लौटने के फोन आते रहते हैं।
आरक्षक ने ट्रांसफर, सस्पेंशन और अटैचमेंट की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। आरोप लगाया कि कई बार बिना जांच के कार्रवाई कर दी जाती है। इससे कर्मचारियों और उनके परिवार पर मानसिक दबाव बढ़ता है।
छुट्टी तक के लिए “झूठ” बोलने की मजबूरी..
पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि पुलिसकर्मियों को जरूरत के मुताबिक छुट्टी नहीं मिलती। इसी कारण कई कर्मचारी वास्तविक कारण छिपाकर काल्पनिक वजह लिखने को मजबूर हो जाते हैं।
“अगर किसी को 5 दिन की जरूरत है तो 2 दिन की छुट्टी मिलती है, इसलिए मजबूरी में झूठे कारण लिखने पड़ते हैं।”
“चमचागिरी का अलग सिस्टम”
आरक्षक ने विभाग में चाटुकारिता और बड़े लोगों के प्रभाव का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि अपराधियों पर कार्रवाई करने से पहले भी यह देखना पड़ता है कि कहीं उनके राजनीतिक संबंध तो नहीं हैं, वरना कार्रवाई करने वाले कर्मचारी का ट्रांसफर तय माना जाता है।
पोस्ट के अंत में आरक्षक ने व्यंग्यात्मक अंदाज में लिखा..
“2026 के AI जमाने में 150 साल पुराने कानून से व्यवस्था चल रही है… अब मेरी बातों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई कर मेरा ट्रांसफर मंगल ग्रह पर मत कर देना।” - आरक्षक हरदेव कुशवाहा
विभाग में चर्चा, अधिकारियों की चुप्पी..
यह पोस्ट वायरल होने के बाद पुलिस विभाग के भीतर भी चर्चा का विषय बनी हुई है। कई पुलिसकर्मी खुलकर तो कुछ नहीं बोल रहे, लेकिन अंदर ही अंदर व्यवस्था को लेकर असंतोष बताया जा रहा है। हालांकि इस पूरे मामले में अब तक किसी वरिष्ठ अधिकारी की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
तरुण गंधर्व की मौत अब सिर्फ एक आत्महत्या का मामला नहीं रह गई, बल्कि उसने पुलिस विभाग के भीतर मौजूद मानसिक दबाव, असमान व्यवहार और संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

