1 सितंबर से अस्पतालों में नहीं होगा कैशलेस इलाज! मरीजों की बढ़ी टेंशन, जानिए पूरा मामला
Friday, Aug 29, 2025-02:46 PM (IST)

भोपाल: मध्यप्रदेश में हेल्थ इंश्योरेंस को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। निजी बीमा कंपनियों और अस्पतालों के बीच भुगतान को लेकर चल रहे विवाद का असर सीधे बीमाधारकों पर पड़ने वाला है। एक सितंबर से दो प्रमुख बीमा कंपनियों के बीमाधारकों का कैशलेस इलाज प्रदेश के अस्पतालों में नहीं हो पाएगा।
बीमाधारकों की चिंता
अस्पतालों और इंश्योरेंस कंपनियों के बीच खींचतान का खामियाजा बीमाधारक मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। इलाज के लिए उन्हें अपनी जेब से नकद भुगतान करना होगा। प्रदेश में करीब 30 लाख लोग निजी कंपनियों के हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज में आते हैं। इनमें ज्यादातर पॉलिसियां 3 से 5 लाख रुपए तक की हैं।
क्यों मचा विवाद?
हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां पुराने कॉन्ट्रैक्ट की दरें बढ़ाने को तैयार नहीं हैं। जबकि अस्पतालों का कहना है कि इलाज की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन बीमा कंपनियां भुगतान कम कर रही हैं और क्लेम सेटलमेंट में देरी भी कर रही हैं। इसी कारण एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स इंडिया ने अपने 15,000 सदस्य अस्पतालों को बजाज एलायंज जैसी कंपनियों के ग्राहकों का कैशलेस इलाज रोकने के निर्देश दिए हैं।
अस्पतालों का तर्क
अस्पतालों का कहना है कि बीमा कंपनियां कैशलेस इलाज के बाद क्लेम पास करने में काफी समय लगाती हैं। बीमा कंपनियां ट्रीटमेंट की लागत घटाकर या कुछ चार्जेस को नॉन-पेएबल बता कर रकम कम कर देती हैं। सबसे बड़ी शिकायत यह है कि कई बार मरीज के छुट्टी लेने के हफ्तों बाद भी बीमा कंपनी से पूरा क्लेम नहीं मिलता। कभी राशि कम मिलती है तो कभी विवाद में फंसी रहती है। इससे अस्पतालों की वित्तीय स्थिति बिगड़ती है और वे कैशलेस सुविधा देने में हिचकिचाने लगते हैं। अस्पतालों का कहना है कि बीमा कंपनियों के दबाव में वे घाटे में इलाज नहीं कर सकते।
सरकारी कंपनियों में राहत
विशेषज्ञों का कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियां न्यू इंडिया इंश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, नेशनल इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस की कैशलेस सुविधा फिलहाल जारी रहेगी। इन कंपनियों में क्लेम कटौती और देरी जैसी समस्या कम देखने को मिलती है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
बीमा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि अक्सर अस्पताल इलाज की वास्तविक लागत और अतिरिक्त चार्जेस छिपाते हैं। वहीं, बीमा कंपनियों का टैरिफ घटाने का दबाव भी विवाद को बढ़ा रहा है। ऐसे हालात में बीमाधारकों की साख और भरोसा दोनों प्रभावित हो रहे हैं।