बागेश्वर धाम में श्रद्धालु की हार्ट अटैक से मौत: मुंबई से आए परिजनों ने छतरपुर में किया अंतिम संस्कार
Thursday, Jun 18, 2026-06:35 PM (IST)
छतरपुर (राजेश चौरसिया): बागेश्वर धाम में दर्शन करने आए मुंबई के एक श्रद्धालु की हार्ट अटैक से मौत हो गई। घटना के बाद स्थानीय पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और सामाजिक लोगों ने परिवार की हर संभव मदद कर मानवता की मिसाल पेश की। मृतक की पहचान मुंबई के आयरोली निवासी 63 वर्षीय सतीश कामद के रूप में हुई है। उनके परिजन मुंबई से छतरपुर पहुंचे और सागर रोड स्थित भैंसासुर मुक्ति धाम में अंतिम संस्कार किया गया।
परिजनों के मुताबिक सतीश कामद 1 जून को बागेश्वर धाम पहुंचे थे और धाम के पास स्थित एक लॉज में ठहरे हुए थे। वे बागेश्वर धाम के नियमित श्रद्धालु थे और अक्सर यहां दर्शन एवं सेवा कार्य के लिए आते रहते थे। 15 जून की शाम वे राम दरबार में मौजूद थे, तभी उन्हें अचानक सीने में दर्द हुआ और हार्ट अटैक आने से उनकी मौत हो गई।
रातभर नहीं लौटे तो परिजनों को दी गई सूचना
बताया गया कि सतीश कामद रात में अपने लॉज के कमरे पर वापस नहीं पहुंचे। इसके बाद आसपास रहने वाली कुछ युवतियों ने उनके परिवार को फोन कर उनके नहीं मिलने की जानकारी दी। जब परिजनों ने उनके मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की तो फोन नहीं उठा। बाद में पुलिस ने उसी नंबर पर संपर्क कर परिवार को उनकी मृत्यु की सूचना दी।
मुंबई से पहुंचे परिजन, भाई ने दी मुखाग्नि
घटना की जानकारी मिलते ही मृतक की पत्नी स्नेह कामद, बेटी कृतिका कामद और भाई दिनेश कामद मुंबई से फ्लाइट के जरिए छतरपुर पहुंचे। जिला अस्पताल में पोस्टमार्टम के बाद बुधवार को भैंसासुर मुक्ति धाम में अंतिम संस्कार किया गया। मृतक के भाई दिनेश कामद ने मुखाग्नि दी।
अंतिम यात्रा में प्रधान आरक्षक रविंद्र मिश्रा, पत्रकार विनोद मिश्रा तथा जिला अस्पताल के कर्मचारी गोविंद और संजय सहित अन्य लोगों ने कंधा देकर संवेदनशीलता और सामाजिक दायित्व का परिचय दिया।
धाम में ही अंतिम सांस लेने की थी इच्छा
मृतक की बेटी कृतिका कामद ने बताया कि उनके पिता बागेश्वर धाम के परम भक्त थे। उनकी अंतिम इच्छा थी कि जीवन की आखिरी सांस बागेश्वर धाम में ही निकले। पत्नी स्नेह कामद ने बताया कि वे यहां फ्लैट लेकर रहने और 108 पीपल के पौधे लगाने का सपना देखते थे। परिवार ने उनकी आस्था और परिस्थितियों को देखते हुए छतरपुर में ही अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। इस घटना ने एक बार फिर साबित किया कि दुख की घड़ी में इंसानियत और सहयोग की भावना ही सबसे बड़ा सहारा होती है।

