नामांकन रद्द होने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं मीनाक्षी नटराजन, कांग्रेस के सभी विधायक दिल्ली तलब
Thursday, Jun 11, 2026-11:41 AM (IST)
भोपाल। मध्य प्रदेश के राज्यसभा चुनाव से जुड़ा मीनाक्षी नटराजन का नामांकन विवाद अब एक साधारण चुनावी विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया, निर्वाचन व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों की परीक्षा का विषय बनता जा रहा है। निर्वाचन आयोग से राहत की उम्मीद टूटने के बाद कांग्रेस ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंचा दिया है, जहां अब देश की सर्वोच्च अदालत की निगाहें इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हैं।
कांग्रेस ने नामांकन निरस्त किए जाने को न केवल कानूनी रूप से चुनौती दी है, बल्कि इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रहार बताते हुए राजनीतिक संघर्ष का भी स्वरूप दे दिया है। पार्टी के वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद विवेक तंखा, अभिषेक मनु सिंघवी सहित कई दिग्गज नेता इस मामले में कानूनी रणनीति तैयार कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट में याचिका सूचीबद्ध होने के बाद अब यह तय होगा कि अदालत इस विवाद पर कब और किस प्रकार सुनवाई करेगी।
इस बीच कांग्रेस ने राजनीतिक स्तर पर भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। राष्ट्रपति से मुलाकात का समय मांगकर पार्टी ने संकेत दे दिया है कि वह इस मुद्दे को केवल अदालत तक सीमित नहीं रखना चाहती। कांग्रेस का मानना है कि यदि किसी प्रत्याशी का नामांकन गलत तथ्यों के आधार पर निरस्त किया गया है तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया का प्रश्न है।
दिल्ली में भी हलचल तेज हो गई है। पार्टी हाईकमान ने मध्य प्रदेश के सभी कांग्रेस विधायकों को 12 जून तक राजधानी पहुंचने के निर्देश दिए हैं। माना जा रहा है कि आगे की रणनीति, राष्ट्रपति से संभावित मुलाकात और अदालत की कार्यवाही को लेकर सामूहिक रूप से निर्णय लिया जाएगा।
विवाद की जड़ उस कथित आपराधिक प्रकरण से जुड़ी है, जिसे आधार बनाकर रिटर्निंग अधिकारी ने मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज किया था। कांग्रेस लगातार दावा कर रही है कि नटराजन के खिलाफ ऐसा कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है और नामांकन रद्द करने का फैसला तथ्यों के विपरीत है। यही तर्क अब सुप्रीम कोर्ट में भी रखा जाएगा।
फिलहाल प्रदेश की राजनीति की निगाहें दिल्ली पर टिकी हैं। अदालत की अगली कार्यवाही न केवल मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी का भविष्य तय करेगी, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगी कि चुनावी प्रक्रिया में उठे ऐसे विवादों पर संवैधानिक संस्थाएं किस तरह संतुलन स्थापित करती हैं। आने वाले कुछ घंटे मध्य प्रदेश की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

