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VHP अध्यक्ष का बड़ा बयान, ‘आरक्षण एक प्रायश्चित है...जातिगत भेदभाव खत्म होने तक आरक्षण रहना चाहिए

Tuesday, Apr 14, 2026-06:16 PM (IST)

इंदौर : संविधान निर्माता डॉ बी आर अंबेडकर की 135वीं जयंती पर उनकी जन्मस्थली महू में विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने मंगलवार को सीएम मोहन यादव की मौजूदगी में कहा कि आरक्षण व्यवस्था तब तक जारी रहनी चाहिए, जब तक समाज में जातिगत भेदभाव का ज़रा भी अंश मौजूद है।

संविधान को "वर्तमान युग की स्मृति" बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी ग्रंथ में लिखी कोई भी बात, जो सभी मनुष्यों की समानता के विरुद्ध हो, उसे अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। "स्मृति" उन ग्रंथों को कहते हैं, जो विद्वानों द्वारा समाज के लिए बनाए गए नियमों और विनियमों पर आधारित होते हैं।

VHP के एक कार्यक्रम के दौरान, कुमार ने संतों और ऋषियों द्वारा पारित एक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि सभी मनुष्य समान हैं और "ऊंच-नीच" या "छूत-अछूत" के आधार पर किया जाने वाला सामाजिक भेदभाव भारतीय आध्यात्मिकता का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि जाति के आधार पर होने वाला अन्याय, भले ही वह एक ही घटना क्यों न हो, पूरे देश के लिए शर्म की बात है।

सरकारी शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में जाति-आधारित आरक्षण व्यवस्था का ज़िक्र करते हुए कुमार ने कहा, "हमारा मानना ​​है कि यह आरक्षण एक प्रायश्चित है, और जब तक ज़रा भी भेदभाव मौजूद है, तब तक आरक्षण ज़रूरी है। इसे (आरक्षण व्यवस्था को) जारी रहना चाहिए।" उन्होंने कहा कि जब तक समाज का एक बड़ा तबका आर्थिक रूप से कमज़ोर रहेगा और शिक्षा, उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्रों में पीछे रहेगा, तब तक समानता हासिल नहीं हो पाएगी।

कुमार ने कहा कि देश की अगली लड़ाई यह सुनिश्चित करना है कि अनुसूचित जातियों को शिक्षा, कौशल और रोज़गार के क्षेत्रों में समान अधिकार मिलें। VHP नेता ने कहा, "यह लोगों को सेवक बनाने के बजाय समृद्ध बनाने की लड़ाई है। इसमें समाज पूरी निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करेगा, और सरकार अपनी ज़िम्मेदारी निभा रही है।"

कुमार ने इस समारोह में देश के प्राचीन धार्मिक ग्रंथ 'मनुस्मृति' का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग 'स्मृतियां' लिखी गई हैं, और कुछ लोग मनुस्मृति तथा अन्य ग्रंथों का भी हवाला देते हैं। "वर्तमान युग में, जिस 'स्मृति' का हम सभी को पालन करना चाहिए और जिसके अनुसार अपना जीवन जीना चाहिए, वह भारत का संविधान है। इसमें जो कुछ भी लिखा है, वह स्वीकार्य है।" उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी भी ग्रंथ में लिखी ऐसी कोई भी बात, जो सभी मनुष्यों की समानता के विरुद्ध हो, उसे अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए।

सामाजिक एकता और समानता के क्षेत्र में डॉ. बी. आर. अंबेडकर के योगदान को याद करते हुए कुमार ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में "बंधुत्व" शब्द उन्हीं की पहल पर जोड़ा गया था। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद, संविधान के लागू होने के साथ ही राजनीतिक समानता तो हासिल हो गई और हर नागरिक को वोट देने का अधिकार भी मिल गया, लेकिन सामाजिक समानता की लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है।


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Content Writer

meena

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