सॉरी मम्मी-पापा...’ सुसाइड नोट में छलका दर्द, NEET अभ्यर्थी की मौत ने खड़े किए कई सवाल,आकांक्षा की कहानी रुला देगी
Wednesday, Jun 03, 2026-12:25 PM (IST)
मऊगंज: मध्यप्रदेश के मऊगंज जिले के एक छोटे से गांव मगनिया में इन दिनों सन्नाटा पसरा है। जिस घर में कभी बेटी के डॉक्टर बनने के सपने सजाए जाते थे, वहां आज उसकी तस्वीर के सामने आंसुओं का सैलाब है। परिवार की उम्मीदों, संघर्षों और एक होनहार छात्रा के सपनों का अंत इतना दर्दनाक होगा, किसी ने सोचा भी नहीं था।
आकांक्षा चतुर्वेदी ने डॉक्टर बनने का सपना देखा था। यह सिर्फ उसका सपना नहीं था, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों का केंद्र था। किसान परिवार से आने वाली आकांक्षा के लिए उसके माता-पिता ने अपनी सामर्थ्य से कहीं ज्यादा संघर्ष किया। कर्ज लिया, खर्चों में कटौती की और हर संभव कोशिश की ताकि बेटी अपने लक्ष्य तक पहुंच सके।
बताया जाता है कि NEET परीक्षा देने के बाद आकांक्षा बेहद खुश थी। उसे विश्वास था कि उसकी मेहनत रंग लाएगी और इस बार मेडिकल कॉलेज का रास्ता खुल जाएगा। लेकिन परीक्षा से जुड़े विवादों और पेपर लीक की खबरों ने उसके आत्मविश्वास को गहरी चोट पहुंचाई। जिस परीक्षा को वह अपने भविष्य की सीढ़ी मान रही थी, उसी पर उठे सवालों ने उसके मन में असुरक्षा और निराशा भर दी।
परिजनों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से वह पहले जैसी नहीं रही थी। बातचीत कम हो गई थी, चेहरे की मुस्कान गायब हो गई थी और भविष्य को लेकर चिंता बढ़ती जा रही थी। शायद वह उन सवालों से जूझ रही थी जिनका जवाब उसके पास नहीं था। परिवार पर पहले से मौजूद आर्थिक बोझ और दोबारा परीक्षा की आशंका उसे भीतर ही भीतर तोड़ रही थी।
20 मई को नागपुर में उसने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। बाद में सामने आए सुसाइड नोट में उसने माता-पिता से माफी मांगते हुए लिखा कि अब उसमें दोबारा परीक्षा देने की हिम्मत नहीं बची है। यह शब्द केवल एक छात्रा की पीड़ा नहीं, बल्कि उस मानसिक दबाव की कहानी भी हैं जिससे देश के लाखों प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थी गुजरते हैं।
आज आकांक्षा इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसका जाना कई सवाल छोड़ गया है। क्या हमारी परीक्षा व्यवस्था युवाओं को पर्याप्त भरोसा दे पा रही है? क्या प्रतियोगी परीक्षाओं का बढ़ता दबाव छात्रों की मानसिक स्थिति पर गंभीर असर नहीं डाल रहा? और क्या सपनों की इस दौड़ में हम अपने बच्चों की भावनाओं को पर्याप्त महत्व दे रहे हैं?
मऊगंज की इस बेटी की कहानी सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं है। यह उन अनगिनत युवाओं की आवाज है, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए हर दिन संघर्ष करते हैं। आकांक्षा लौटकर नहीं आएगी, लेकिन उसका अधूरा सपना व्यवस्था और समाज दोनों से जवाब जरूर मांगता रहेगा।

