मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पर सुप्रीम कोर्ट में कल सुनवाई, कांग्रेस ने रिजल्ट रोकने की उठाई मांग
Thursday, Jun 11, 2026-01:59 PM (IST)
भोपाल। मध्य प्रदेश की राज्यसभा राजनीति अब संवैधानिक और कानूनी मोड़ पर पहुंच गई है। कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद शुरू हुआ विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच चुका है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस ने मामले की तत्काल सुनवाई और चुनावी प्रक्रिया पर रोक की मांग की, जबकि चुनाव आयोग ने याचिका की प्रति नहीं मिलने का हवाला देते हुए जवाब के लिए समय मांगा। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले को शुक्रवार के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
हालांकि सुनवाई टल गई, लेकिन सियासी हलकों में बेचैनी बढ़ गई है। कांग्रेस का तर्क है कि नामांकन खारिज करने का फैसला कानूनी आधारों पर नहीं बल्कि मनमाने ढंग से लिया गया है। पार्टी का आरोप है कि रिटर्निंग ऑफिसर ने नियमों की गलत व्याख्या कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित किया है।
सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ कोई लंबित आपराधिक मामला नहीं है। तेलंगाना की अदालत से केवल एक कारण बताओ नोटिस जारी हुआ था, जिसे लंबित मुकदमा नहीं माना जा सकता। ऐसे में हलफनामे में उसका उल्लेख न करना नामांकन रद्द करने का आधार नहीं बन सकता।
उधर, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि अन्य राज्यों में आयोग ने हस्तक्षेप किया है तो मध्य प्रदेश में चुप्पी क्यों साधी गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग निष्पक्ष संवैधानिक संस्था की बजाय राजनीतिक दबाव में काम करता नजर आ रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच गुरुवार दोपहर 3 बजे की समय-सीमा सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि तब तक कोई राहत नहीं मिलती है तो भाजपा के तीनों उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचन लगभग तय माना जा रहा है। वहीं कांग्रेस ने राजनीतिक और संवैधानिक दबाव बढ़ाने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात का भी फैसला किया है।
अब सबकी निगाहें शुक्रवार को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि अदालत या चुनाव आयोग मीनाक्षी नटराजन को राहत देता है तो राज्यसभा चुनाव फिर से मुकाबले में बदल सकता है। लेकिन यदि राहत नहीं मिली तो मध्य प्रदेश की तीनों राज्यसभा सीटें भाजपा के खाते में बिना मतदान के चली जाएंगी।
फिलहाल यह मामला केवल एक उम्मीदवार के नामांकन का नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले 24 घंटे मध्य प्रदेश की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।

